वर्तमान शिक्षा पद्धति में योग शिक्षा की उपादेयता (राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में)
Abstract
Hindiशिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का उर्ध्वगामी व सर्वांगीण विकास करना है। शिक्षा की व्याख्या करते हुए स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि शिक्षा का अर्थ है उस पूर्णता को व्यक्त करना जो सब मनुष्यों में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। इन अर्थों में शिक्षा मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करती है या उसके विकास की पृष्ठभूमि बनाती है। स्वतंत्र देश के युवा नागरिकों में आवश्यक नैतिक, चारित्रिक तथा बौद्धिक गुणों का विकास होना चाहिए। उतना विकास करने में हमारी आज की शिक्षा पद्धति असमर्थ सिद्ध हो रही है। समाज तथा विश्व में मानव के प्रति जो दृष्टिकोण एक विकासशील देश के उत्तरदायी नागरिक में होना आवश्यक होता है, उसे उत्पन्न करने में भी यह आधुनिक शिक्षा लगभग असमर्थ प्रतीत होती है । वर्तमान समय में गला काट प्रतियोगिता विद्यार्थियों के मन को घोर अवसाद की ओर ले जा रहा है। जिससे विद्यार्थी का मन अत्यंत क्षुब्ध व अशांत होकर गहन बोझ का अनुभव करता है। जो वर्तमान में विद्यार्थियों के मध्य आत्महत्या कर लेने का प्रमुख कारण बना हुआ है । गीता का उद्घोष है कि अशान्तस्य कुतः सुखम्।
भारतीय जीवन परम्परा में योग शिक्षा ही
