हिंदी साहित्य के मनोवैज्ञानिक उपन्यास : एक अध्ययन
Abstract
Hindiहिन्दी उपन्यासों में मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति का विकास प्रेमचन्द युग एवं प्रेमचन्दोत्तर युग की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। जहाँ प्रेमचन्द ने निर्मला, गबन और गोदान में सामाजिक यथार्थ के साथ पात्रों की मानसिकता को उभारा, वहीं जैनेन्द्र ने परख, त्यागपत्र आदि में व्यक्ति के अंतर्मन की हलचलों को केन्द्र में लाकर मनोवैज्ञानिक उपन्यास को एक विशिष्ट दिशा दी। हिंदी के मनोवैज्ञानिक साहित्यकारों में फ्रायड, युंग तथा एडलर जैसे विचारकों के प्रभाव तथा मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं ने इस प्रवृत्ति को और सुदृढ़ किया। इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय, श्रीकान्त वर्मा, गिरिराज किशोर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश और निर्मल वर्मा इत्यादि जैसे उपन्यासकारों ने अपने साहित्य में कुण्ठा, तनाव, आत्महीनता और अवचेतन की जटिलताओं को उकेरकर इस परम्परा को व्यापक आयाम प्रदान किए। इसी धारा में महिला उपन्यासकारों जैसे कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल आदि ने नारी मनोविज्ञान को नए सन्दर्भ प्रदान किए। इक्कीसवीं सदी में मनीषा कुलश्रेष्ठ के स्वप्नपाश ने इस मनोवैज्ञानिक परम्परा को समकालीन संवेदना के साथ आगे बढ़ाया।
