📚 Issue II | Year I · April 2024 · pp. 1-4

नागार्जुन के उपन्यास ‘कुम्भीपाक’ में चित्रित स्त्री संघर्ष

अस
अवनीश सिंह नरवरिया डॉ. सोलंकी प्रतिभा
शोधार्थी
Hindi

Abstract

Hindi

प्रकृति और पुरुष के समन्वय से ही संसार की सृष्टि संभव है, पुरुष प्रकृति से ही विषम परिस्थितियों में अनुकूल शक्ति प्राप्त करता है। इसी शक्ति के सहारे मनुष्य सदियों जीवन जीने के लिए प्रयत्नशील है। विश्व के इतिहास, विशेषतः भारतीय इतिहास को देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक काल को छोड़कर, न तो भारतीय स्त्री कभी स्वावलम्बी बन पाई और न तो पुरुष अपने अहम से मुक्त हो पाया। कुछ अपवादों को छोड़कर, प्राचीनकाल से ही स्त्री की अस्मिता को उभरने का मौका ही नहीं मिला। उसकी पहचान एक गुलाम, नौकरानी, कमजोर के रूप में करायी गयी। नारी अस्मिता के लिए अनेक बाधाएँ प्राचीनकाल में भी थी और आज भी हैं, पर आधुनिकता के आरंभ से स्त्री जागरूकता का दौर आरंभ हुआ। सन् 1970 के बाद तो परंपरागत पुरुष प्रधान व्यवस्था को तोड़कर नारी अपनी अस्मिता को बनाए रखने का प्रयास करने लगी है। नागार्जुन ने अपने उपन्यासों में ऐसे ही स्त्रीपात्रों को विशेष स्थान देते हुए उनके सामाजिक संघर्ष और विवशता को उजागर किया है। जिसमें विधवाविवाह, अनमेल विवाह, दहेजप्रथा, बलात्कार, अशिक्षा आदि। ‘कुम्भीपाक’ उपन्यास में नागार्जुन इन सारी समस्याओं को

Keywords

प्रकृति पुरुष कुम्भीपाक उपन्यास नागार्जुन वैदिक काल भारतीय स्त्री सामाजिक संघर्ष नारी अस्मिता स्त्री मुक्ति शिक्षा आर्थिक स्वावलंबता ।

Paper Details

Issue
Issue II | Year I
Published
April 2024
Pages
pp. 1-4
Language
Hindi
ISSN
3048-6319 (Online)
Publisher
Baraudi Sanskriti Sanskrit Sanskar Shiksha Samiti

How to Cite

अवनीश सिंह नरवरिया डॉ. सोलंकी प्रतिभा. "नागार्जुन के उपन्यास ‘कुम्भीपाक’ में चित्रित स्त्री संघर्ष." Bundelkhand Vimarsh, Issue II | Year I (April 2024), pp. 1-4. ISSN: 3048-6319.