किरातार्जुनीय महाकाव्य में सन्निहित ज्योतिषशास्त्रीय तत्त्वों का विश्लेषण
Abstract
Hindiसंस्कृत साहित्य में तीन अत्यन्त विशाल आकृति वाले महाकाव्यों को बृहत्त्रयी की संज्ञा दी गयी है । बृहत्त्रयी में किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम् एवं नैषधीयचरितम् इन तीन महाकाव्यों को सम्मिलित किया जाता है । बृहत्त्रयी महाकाव्यों में अन्तर्निहित इन तीन महाकाव्यों में से प्रथम किरातार्जुनीय महाकाव्य की रचना महाकवि भारवि ने की है । द्वितीय शिशुपालवध महाकाव्य महाकवि माघ द्वारा विरचित है । अन्तिम नैषधीयचरित महाकाव्य महाकवि श्रीहर्ष द्वारा लिखित है । संस्कृत साहित्य के बृहत्त्रयी काव्यसमूह में कवि भारविकृत किरातार्जुनीय को प्रथम स्थान प्राप्त है । संस्कृत साहित्य के इतिहास में महाकवि कालीदास की वैदर्भी रीति के बाद छठी शताब्दी में एक नई रीति विकसित हुई । पांचाली नामक इस रीति के प्रवर्तक कवि भारवि हैं । इनको संस्कृत साहित्य के प्रौढ कवियों में अन्यतम माना जाता है । भारवि का कवित्व अर्थगौरव के कारण प्रसिद्ध है - ‘भारवेरर्थगौरवम्' । यद्यपि भारवि को मितभाषी समझ जाता है, तथापि यह समझना होगा कि शब्दों में विशिष्ट अर्थ प्रतिष्ठापित करने में वे उतनी ही अधिक शक्ति का प्रयोग करते हैं । इसीलिए किरातार्जुनीय
