सांख्यदर्शन में पुरुष तत्त्व का विवेचन
Abstract
Hindiभारतीय ज्ञान परम्परा में दर्शन का विशेष महत्वा है। सांख्यदर्शन में ‘पुरुष’ तत्त्व को शुद्ध, नित्य और स्वयंसिद्ध चेतना माना गया है। यह पूर्णतः निर्गुण, निष्क्रिय और अविकारी सत्ता है, जो न किसी कर्म में प्रवृत्त होती है और न किसी विकार को ग्रहण करती है। पुरुष का मुख्य स्वरूप साक्षित्व है वह केवल देखने वाला, जानने वाला और अनुभव का आधार प्रदान करने वाला तत्त्व है। प्रकृति और उसके त्रिगुणों सत्त्व, रजस् और तमस् से पुरुष का कोई वास्तविक संबंध नहीं होता; दोनों अनादि होने पर भी परस्पर भिन्न हैं। फिर भी, उनके सामीप्य से ही व्यक्त जगत की प्रक्रिया प्रारंभ होती है और जीव में कर्तृत्व-भोक्तृत्व का मिथ्या आरोप होता है। सांख्य के अनुसार प्रत्येक जीव के भीतर एक स्वतंत्र पुरुष स्थित है। प्रकृति के व्यवहार से अलग होते ही पुरुष की स्वाभाविक मुक्त अवस्था का बोध होता है। इस प्रकार पुरुष सांख्य मीमांसा का मूल आध्यात्मिक आधार है।
