हिन्दी उपन्यासों में दिव्यांग विमर्श
Abstract
Hindiहिन्दी उपन्यासों में दिव्यांग विमर्श की शुरूआत प्रेमचंद के रंगभूमि उपन्यास से सन 1924 में होती है। रंगभूमि का नायक सूरदास है, जोकि दिव्यांग है और काशी के पास में बसे पांडेपुर गाँव का रहने वाला है। ऐसा माना जाता है कि प्रेमचंद को उपन्यास में नायक सूरदास के सृजन की प्रेरणा गाँव के अंधे भिखारी से मिली थी। 21 वीं सदी में समकालीन विमर्श के परिदृश्य में दिव्यांग सशक्तिकरण के लिए हिन्दी साहित्य में एक नए विमर्श - 'विकलांग विमर्श' का प्रवर्तन समकालीन विमर्शों की धरती बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में साहित्यमनीषी, भाषाविद और आलोचक डॉ० विनय कुमार पाठक जी ने किया है। हिन्दी उपन्यासों में कथासम्राट प्रेमचंद के 'रंगभूमि' उपन्यास से लेकर समकालीन उपन्यास 'इनबॉक्स' में दिव्यांग - जीवन की मुखर अभिव्यक्ति हुई है। इन उपन्यासों ने दिव्यांगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं, उनकी परिस्थितियों और उनके जीवन संघर्षों को बेबाकी से उठाया है इसलिए इन उपन्यासों की दिव्यांग - सशक्तिकरण की दशा और दिशा में उल्लेखनीय भूमिका है।
